चौगान किला और देव राधा-कृष्ण मंदिर उपेक्षा का शिकार सदियों पुरानी ऐतिहासिक धरोहर पर मंडरा रहा अस्तित्व का संकट, संरक्षण के अभाव में जर्जर हो रहा मंदिर
- bySatendra Mishra
- 10 Jun 2026, 07:09 PM
- 8 Mins
चौगान किला और देव राधा-कृष्ण मंदिर उपेक्षा का शिकार
सदियों पुरानी ऐतिहासिक धरोहर पर मंडरा रहा अस्तित्व का संकट, संरक्षण के अभाव में जर्जर हो रहा मंदिर
गाडरवारा। नरसिंहपुर जिले की ऐतिहासिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत के रूप में पहचान रखने वाला प्राचीन चौगान देव राधा-कृष्ण मंदिर आज प्रशासनिक उपेक्षा और संरक्षण के अभाव का दर्द झेल रहा है। ग्राम पंचायत भैरोपुर, तहसील गाडरवारा की सीमा में स्थित यह प्राचीन मंदिर धीरे-धीरे जर्जर अवस्था की ओर बढ़ रहा है। स्थानीय श्रद्धालुओं, इतिहास प्रेमियों और ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते इस धरोहर के संरक्षण एवं जीर्णोद्धार की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में क्षेत्र की यह ऐतिहासिक पहचान केवल इतिहास के पन्नों तक सिमट कर रह जाएगी। सतपुड़ा पर्वतमाला की ऊंची पहाड़ियों में स्थित ऐतिहासिक चौगान (चौरागढ़) किला क्षेत्र गोंड शासनकाल और बाद में मराठा शासनकाल की सांस्कृतिक एवं धार्मिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। इतिहास और स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार इस क्षेत्र में अनेक मठ, मंदिर एवं धार्मिक स्थलों की स्थापना की गई थी, जिनमें देव राधा-कृष्ण मंदिर का विशेष महत्व माना जाता है। क्षेत्र के बुजुर्ग बताते हैं कि यह मंदिर सदियों से श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक आस्था का केंद्र रहा है तथा इसका संबंध गोंड साम्राज्य और वीरांगना रानी दुर्गावती के कालखंड से भी जोड़ा जाता है।
मंदिर की स्थापत्य कला, प्राचीन निर्माण शैली और धार्मिक महत्व इसे क्षेत्र की अमूल्य धरोहर बनाते हैं। वर्षों से यहां आसपास के गांवों सहित दूर-दराज क्षेत्रों से श्रद्धालु दर्शन एवं पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते रहे हैं। लेकिन विडंबना यह है कि जिस धरोहर ने पीढ़ियों तक लोगों की आस्था को संजोए रखा, आज वही धरोहर अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रही है।
स्थानीय लोगों के अनुसार मंदिर की दीवारों में दरारें दिखाई देने लगी हैं, छत और अन्य संरचनात्मक हिस्सों में भी समय के साथ क्षरण बढ़ता जा रहा है। बरसात, मौसम की मार और नियमित रखरखाव के अभाव में मंदिर की स्थिति लगातार खराब होती जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि मंदिर की मरम्मत एवं संरक्षण को लेकर कई बार ग्राम पंचायत, सरपंच, जनप्रतिनिधियों तथा संबंधित विभागों के अधिकारियों से गुहार लगाई गई। अनेक अवसरों पर मंदिर की जर्जर स्थिति से अवगत कराया गया और मरम्मत की मांग रखी गई, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई।
ग्रामीणों और श्रद्धालुओं का आरोप है कि बार-बार निवेदन और अपेक्षाओं के बावजूद इस प्राचीन धरोहर की ओर किसी का गंभीर ध्यान केंद्रित होता दिखाई नहीं दे रहा है। लोगों का कहना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले समय में मंदिर को अपूरणीय क्षति पहुंच सकती है।
इतिहास प्रेमियों का मानना है कि चौगान किला और उससे जुड़ा यह प्राचीन देव राधा-कृष्ण मंदिर केवल धार्मिक महत्व का केंद्र नहीं, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत, ऐतिहासिक पहचान और पर्यटन संभावनाओं का भी महत्वपूर्ण आधार है। यदि इस स्थल का संरक्षण किया जाए, पहुंच मार्गों का विकास हो, आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं और इसके ऐतिहासिक महत्व का प्रचार-प्रसार किया जाए तो यह स्थान धार्मिक एवं ऐतिहासिक पर्यटन के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित हो सकता है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर कब तक यह ऐतिहासिक धरोहर उपेक्षा का शिकार बनी रहेगी? क्या संबंधित विभाग और जिम्मेदार इस ओर गंभीर पहल करेंगे, या फिर संरक्षण के अभाव में क्षेत्र की यह अनमोल विरासत धीरे-धीरे इतिहास बन जाएगी?
Satendra Mishra
संवाददाता एक अनुभवी पत्रकार हैं, जिन्हें राजनीति, प्रशासन और सामाजिक मुद्दों की रिपोर्टिंग का व्यापक अनुभव है। वे जमीनी स्तर की खबरों को निष्पक्ष और तथ्यात्मक रूप में पाठकों तक पहुँचाने पर विश्वास रखते हैं। उनका मुख्य उद्देश्य विश्वसनीय जानकारी के साथ जनहित से जुड़े विषयों को सरल भाषा में प्रस्तुत करना है।
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