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मध्यप्रदेश नरसिंहपुर स्वास्थ्य विभाग में 'इलाज' नहीं, 'मरीजों की जान से खिलवाड़' ​भ्रष्टाचार और लापरवाही की हदें पार

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नरसिंहपुर स्वास्थ्य विभाग में 'इलाज' नहीं, 'मरीजों की जान से खिलवाड़'

​भ्रष्टाचार और लापरवाही की हदें पार; रसूखदारों को संरक्षण, 'वेंटिलेटर' पर जिला प्रशासन!

नरसिंहपुर। सरकारी अस्पताल किसी भी आम नागरिक के लिए उम्मीद और भरोसे का आखिरी ठिकाना होते हैं। लेकिन मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले से जो तस्वीरें और खबरें सामने आ रही हैं, वे केवल विचलित करने वाली नहीं हैं, बल्कि यह साबित करने के लिए काफी हैं कि यहाँ का स्वास्थ्य विभाग प्रशासनिक और नैतिक रूप से पूरी तरह वेंटिलेटर पर आ चुका है। मासूम बच्चों को चूहे कुतर रहे हैं, मुफ्त इलाज के नाम पर गरीबों की जेब पर डाका डाला जा रहा है, और अयोग्य लोग डॉक्टरों की जगह मरीजों को इंजेक्शन ठोक रहे हैं।

​जनता के टैक्स के पैसों पर पलने वाले जिम्मेदार अधिकारी इस खूनी खेल पर मौन साधे बैठे हैं। आइए सिलसिलेवार ढंग से बेनकाब करते हैं नरसिंहपुर स्वास्थ्य विभाग के इन 9 'ब्लैक स्पॉट' को:

​1. गाड़रवारा अस्पताल का शर्मनाक सच: नवजात को चूहों ने कुतरा

​गाड़रवारा शासकीय अस्पताल में सुरक्षा और मातृत्व के दावों की धज्जियां तब उड़ गईं, जब एक मासूम नवजात बच्चे को चूहों द्वारा काटने का मामला सामने आया। यह केवल एक लापरवाही नहीं, बल्कि आपराधिक संवेदनहीनता है। जो मासूम खुद अपनी सुरक्षा नहीं कर सकते, उन्हें अस्पताल प्रबंधन ने चूहों के हवाले छोड़ दिया।

  • जानलेवा खतरा: चूहों के काटने से रैट-बाइट फीवर (Rat-bite fever) और लेप्टोस्पायरोसिस (Leptospirosis) जैसी जानलेवा बीमारियां हो सकती हैं।
  • प्रशासनिक नाकामी: लाखों रुपये के बजट के बावजूद अस्पताल में बुनियादी साफ-सफाई और पेस्ट कंट्रोल (Pest Control) न होना साफ तौर पर भ्रष्टाचार को दर्शाता है।

​2. जिला अस्पताल में खुली लूट: ऑपरेशन के नाम पर 'रिश्वतखोरी'

​एक तरफ सरकार 'आयुष्मान भारत' और मुफ्त सर्जिकल योजनाओं का ढिंढोरा पीटती है, तो दूसरी तरफ नरसिंहपुर जिला अस्पताल में गरीब मरीजों की लाचारी का सौदा हो रहा है। यहाँ मुफ्त ऑपरेशन करने के बदले मरीजों से सीधे तौर पर ₹3,000 से ₹5,000 तक की रिश्वत मांगी जा रही है। यह सीधे तौर पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम का उल्लंघन है।

​3. डॉ. पंकज थारवानी पर मेहरबानी क्यों?

​जब गंभीर अनियमितताओं के आरोपों के बावजूद डॉ. पंकज थारवानी जैसे अधिकारियों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती, तो जनता का इस पूरी व्यवस्था से भरोसा उठ जाता है। आरोपों के बाद भी कार्रवाई की फाइल का दबा रहना यह साफ करता है कि भ्रष्टाचारियों को शीर्ष स्तर से राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है।

​4. नियम ताक पर: निजी फायदे के लिए तोड़ी अस्पताल की दीवार

​गाडरवारा अस्पताल की बाउंड्री वॉल (सुरक्षा दीवार) को तोड़कर अपनी निजी क्लीनिक के लिए रास्ता बनाने का एक गंभीर मामला सामने आया है। इस अवैध कृत्य के सारे पुख्ता सबूत जिला स्वास्थ्य अधिकारी को सौंपे जा चुके हैं, लेकिन हफ्तों बीत जाने के बाद भी इस रसूखदार तंत्र पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है।

​5. साईंखेड़ा CHC में मौत का लाइव खेल: सफाईकर्मी लगा रहे इंजेक्शन!

​साईंखेड़ा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) से जो हकीकत सामने आई है, वह रोंगटे खड़े करने वाली है। यहाँ योग्य नर्सिंग स्टाफ की मौजूदगी के बावजूद, चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों और सफाईकर्मियों द्वारा मरीजों को ड्रिप (बोतल) चढ़ाई जा रही है और इंजेक्शन लगाए जा रहे हैं।

  • सीधी मौत को बुलावा: बिना ट्रेनिंग प्राप्त व्यक्ति द्वारा ड्रिप लगाने से यदि नस में हवा चली जाए (Air Embolism), तो मरीज की मौके पर ही मौत हो सकती है। डॉक्टरों की यह करतूत सीधे तौर पर गैर-इरादतन हत्या की कोशिश है।

​6. गाडरवारा अस्पताल का नया कारनामा: अब 'सुरक्षा गार्ड' बना डॉक्टर!

​अस्पताल प्रबंधन की लापरवाही का एक और सबसे घिनौना और हैरान करने वाला चेहरा गाडरवारा शासकीय अस्पताल में तब देखने को मिला, जब यहाँ सुरक्षा के लिए तैनात एक 'सिक्योरिटी गार्ड' को मरीजों को इंजेक्शन लगाते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया।

  • सवाल जो दफन कर दिए गए: जिस गार्ड का काम अस्पताल की सुरक्षा करना है, वह मरीजों की नसों के साथ खिलवाड़ कैसे कर रहा था? किसकी शह पर उसे सिरिंज और दवाइयां सौंपी गईं?
  • दोषियों पर मेहरबानी: इस रोंगटे खड़े कर देने वाले मामले के उजागर होने के बाद भी आज तक संबंधित गार्ड और जिम्मेदार अधिकारियों पर क्या कार्रवाई हुई, यह आज भी एक रहस्य बना हुआ है। पूरी घटना को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है।

​7. जिला स्वास्थ्य अधिकारी की 'क्लीन चिट' नीति

​स्वास्थ्य विभाग के भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने के लिए खुद जिला स्वास्थ्य अधिकारी और उनकी विशेष जांच टीम सक्रिय भूमिका निभा रही है। धरातल पर मौजूद अनियमितताओं को छुपाने के लिए बंद कमरों में बैठकर 'सब कुछ ठीक है' की झूठी जांच रिपोर्ट तैयार की जा रही हैं, ताकि दोषी डॉक्टरों और अधिकारियों को बचाया जा सके।

​8. जनसुनवाई भी बेअसर: प्रीति नाथ की शिकायत पर प्रशासन का मौन

​न्याय की आस में पीड़ित प्रीति नाथ द्वारा नरसिंहपुर कलेक्टर की 'जनसुनवाई' में बकायदा लिखित शिकायत दर्ज कराई गई थी। लेकिन विडंबना देखिए कि पीड़ितों की चीखें कलेक्टर चैंबर की दीवारों को भी नहीं भेद पा रही हैं। इस गंभीर शिकायत को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है।

​9. महीनों बीतने के बाद भी 'शून्य' कार्रवाई

​इन तमाम मामलों और शिकायतों को दर्ज हुए महीनों बीत चुके हैं, लेकिन स्वास्थ्य विभाग की घोर लापरवाही और कचरपट्टी रवैये के चलते अभी तक किसी भी मामले में कोई निष्पक्ष जांच शुरू नहीं हुई है। साफ तौर पर पूरा प्रशासनिक अमला दोषी डॉक्टरों और भ्रष्ट अधिकारियों को बचाने के लिए ढाल बनकर खड़ा हो गया है।

​📢 जनता का सीधा सवाल: कलेक्टर और CMHO कब जागेंगे?

​नरसिंहपुर जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था की यह बानगी चीख-चीख कर कह रही है कि यहाँ आम आदमी की जान की कीमत कौड़ियों के भाव है। रसूखदारों को संरक्षण, गरीबों से उगाही और मरीजों की जान से खिलवाड़ ही यहाँ का नया 'प्रोटोकॉल' बन चुका है।

​क्या जिले के आला अधिकारी (कलेक्टर) और मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) इन मामलों पर संज्ञान लेकर दोषियों को जेल भेजेंगे, या हमेशा की तरह 'जांच कमेटी' का लॉलीपॉप थमाकर मामले को रफा-दफा कर दिया जाएगा? नरसिंहपुर की पीड़ित जनता अब सीधे और ठोस जवाब मांग रही है।

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Author

Satendra Mishra

संवाददाता एक अनुभवी पत्रकार हैं, जिन्हें राजनीति, प्रशासन और सामाजिक मुद्दों की रिपोर्टिंग का व्यापक अनुभव है। वे जमीनी स्तर की खबरों को निष्पक्ष और तथ्यात्मक रूप में पाठकों तक पहुँचाने पर विश्वास रखते हैं। उनका मुख्य उद्देश्य विश्वसनीय जानकारी के साथ जनहित से जुड़े विषयों को सरल भाषा में प्रस्तुत करना है।