संगीतमय श्री नर्मदा पुराण कथा एवं रूद्रीनिर्माण रूद्राभिषेक कार्यक्रम जारी पुरुषोत्तम माह के पावन अवसर पर स्थानीय आजाद वार्ड स्थित इंद्रा कॉलोनी में दिनांक 17 मई से 23 मई 2026 तक आयोजित हो रहे संगीतमय श्री नर्मदा पुराण कथा एवं रुद्री निर्माण
- bySatendra Mishra
- 22 May 2026, 06:16 PM
- 6 Mins
संगीतमय श्री नर्मदा पुराण कथा एवं रूद्रीनिर्माण रूद्राभिषेक कार्यक्रम जारी
गाडरवारा। पुरुषोत्तम माह के पावन अवसर पर स्थानीय आजाद वार्ड स्थित इंद्रा कॉलोनी में दिनांक 17 मई से 23 मई 2026 तक आयोजित हो रहे संगीतमय श्री नर्मदा पुराण कथा एवं रुद्री निर्माण, रुद्राभिषेक कार्यक्रम जारी है। इस धार्मिक अनुष्ठान में शुरू दिन कलश यात्रा निकाली गई। प्रतिदिन कथा स्थल पर श्रद्धालुओं द्वारा रुद्री निर्माण कर रुद्राभिषेक किया जाता है। प्रतिदिन रात्रि के समय संगीतमय नर्मदा पुराण कथा,कथा व्यास भागवतोपासक स्वामी विश्वनाथ शास्त्री द्वारा सुनाई जाती है। उन्होंने नर्मदा पुराण कथा सुनाते हुए कहा कि जब भगवान शिव अमरकंटक के मैकल पर्वतों पर घोर तपस्या में लीन थे, तब उनके शरीर से निकले स्वेद (पसीने) की बूंदों से एक अत्यंत सुंदर कन्या प्रकट हुई। इसी कारण मां नर्मदा को शिवपुत्री, 'शंकरकन्या' या 'रेवा' कहा जाता है। इनके अलौकिक रूप और लीलाओं को देखकर स्वयं शिव-पार्वती हर्षित हो उठे और उन्होंने कहा कि तुमने हमारे हृदय को 'नर्म' (सुख/आनंद) दिया है, इसलिए तुम्हारा नाम 'नर्मदा' होगा। उन्होंने कथा में आगे कहा कि नर्मदा पुराण में अन्य पवित्र नदियों की तुलना में माँ नर्मदा को एक विशेष वरदान प्राप्त है। जहाँ गंगा नदी में स्नान करने से पुण्य मिलता है, वहीं माँ नर्मदा के केवल दर्शन मात्र से मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं। पौराणिक मान्यता है कि स्वयं गंगा जी हर वर्ष कृष्ण पक्ष की सप्तमी को काली गाय का रूप धारण कर माँ नर्मदा के शरणागत आती हैं। उन्होंने बताया कि भौगोलिक और पौराणिक दोनों ही दृष्टि से नर्मदा का प्रवाह अनोखा है। जहाँ भारत की अधिकांश बड़ी नदियाँ पूर्व की ओर बहकर बंगाल की खाड़ी में मिलती हैं, वहीं नर्मदा अमरकंटक से निकलकर पश्चिम की ओर बहती हुई अरब सागर में विलीन होती हैं। कथाओं में इसे उनके स्वाभिमान, दृढ़ संकल्प और राजा सोनभद्र से हुए उनके वैराग्य की कथा से जोड़कर देखा जाता है।नर्मदा नदी के तल से निकलने वाले हर पत्थर को साक्षात शिव का रूप माना जाता है, जिन्हें 'नर्मदेश्वर शिवलिंग' कहते हैं।इन शिवलिंगों को प्राण-प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं होती इन्हें सीधे घर या मंदिर में स्थापित कर पूजा जा सकता है। उन्होंने नर्मदा परिक्रमा का महात्म्य बताते हुए कहा कि नर्मदा संसार की एकमात्र ऐसी नदी हैं जिनकी पूरी परिक्रमा पैदल या वाहनों के माध्यम से की जाती है। नर्मदा महापुराण केवल एक नदी की कहानी नहीं है, बल्कि यह इंसानी अहंकार को त्यागकर समपर्ण और प्रकृति को परमात्मा मानकर जीने की कला सिखाती है। इसीलिए भक्त आज भी श्रद्धा से नर्मदे हर उद्घोष करते है। 24 मई को महाप्रसादी से कथा का समापन होगा। श्री गणेश मंडल समिति एवं समस्त कॉलोनीवासियो ने धर्मप्रेमी श्रद्धालुओं से उपस्थिति की अपील की है
Satendra Mishra
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