पंद्रह दिवसीय श्री शिव कथा एवं श्री रुद्राभिषेक अनुष्ठान जारी शिव का वास्तविक अर्थ कल्याण : स्वामी नारायणानंद तार्थ महाराज गाडरवारा। क्षेत्र के चाँवरपाठा ब्लॉक अंतर्गत ब्रह्मलीन तपोनिष्ठ संत श्री रामदास जी महाराज की तपोभूमि माँ नर्मदा उत्तर तट
- bySatendra Mishra
- 01 Jun 2026, 07:34 PM
- 5 Mins
पंद्रह दिवसीय श्री शिव कथा एवं श्री रुद्राभिषेक अनुष्ठान जारी
शिव का वास्तविक अर्थ कल्याण : स्वामी नारायणानंद तार्थ महाराज
गाडरवारा। क्षेत्र के चाँवरपाठा ब्लॉक अंतर्गत ब्रह्मलीन तपोनिष्ठ संत श्री रामदास जी महाराज की तपोभूमि माँ नर्मदा उत्तर तट पदम् घाट में पावन पुरुषोत्तम मास के पावन अवसर पर पंद्रह दिवसीय श्री शिव कथा एवं श्री रुद्राभिषेक अनुष्ठान का आयोजन अनंत श्री विभूषित श्री श्री काशी धर्म पीठाधीश्वर जगत गुरु शंकराचार्य स्वामी नारायणानंद तीर्थ जी महाराज के पावन सानिध्य में जारी है।9 जून तक होने वाले इस आयोजन में प्रतिदिन सुबह 6 बजे से रुद्राभिषेक अनुष्ठान, 8 बजे से आरती पूजन, 3 बजे से सत्संग प्रवचन एवं शाम 7 बजे से संध्याकालीन आरती आदि धार्मिक आयोजन हों रहे है। आयोजन में क्षेत्रीय श्रद्धालु बड़ी संख्या में सहभागिता करते हुए धर्म लाभ ले रहे है। सत्संग कार्यक्रम में स्वामी नारायणा नंद तीर्थ जी महाराज ने कहा कि शिव का वास्तविक अर्थ कल्याण है। 'शिव' कोई डरावना या केवल संहार करने वाला रूप नहीं है। उन्होंने कहा कि जो हर परिस्थिति में जीव का मंगल करे, वही शिव है। चाहे जीवन में सुख आए या दुख, उसे शिव की मर्जी मानकर स्वीकार करने से मन में शांति आती है। उन्होंने कहा कि भगवान शिव को केवल एक लोटा जल और बेलपत्र से भी प्रसन्न किया जा सकता है, लेकिन उसके साथ अहंकार का त्याग जरूरी है। जब तक भीतर 'मैं' (अहंकार) का भाव रहेगा, तब तक शिव (कल्याण) का प्रवेश नहीं हो सकता। उन्होंने आगे कहा कि महादेव परम वैरागी होकर भी पूर्ण गृहस्थ हैं। उनका जीवन सिखाता है कि संसार की सुख-सुविधाओं के बीच रहते हुए भी मन से अनासक्त कैसे रहा जाए। उन्होंने शिवकथा में आगे कहा कि "तुुम पुुनि राम राम दिन राती।" अर्थात भगवान शिव स्वयं चौबीसों घंटे श्री राम के नाम का जप करते हैं और श्री राम जी शिव जी को अपना आराध्य मानते हैं।इसलिए शिव की भक्ति बिना राम-नाम के अधूरी है। उन्होंने कहा कि शिवकथा सुनने का असली लाभ तब है जब हमारे भीतर का 'विष' यानि काम, क्रोध, लोभ, मोह शांत हो जाए और हम समाज के लिए 'अमृत' यानि सेवा और प्रेम बांटने वाले बन सकें।
Satendra Mishra
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