“सर्दी-जुकाम से गई जान या डॉक्टर की लापरवाही का शिकार हुई महिला?” नरसिंहपुर की स्वास्थ्य व्यवस्था कटघरे में, जांच पर उठे गंभीर सवाल गाडरवारा/नरसिंहपुर। नरसिंहपुर जिले से सामने आया एक सनसनीखेज मामला
- bySatendra Mishra
- 17 May 2026, 07:10 PM
- 6 Mins
“सर्दी-जुकाम से गई जान या डॉक्टर की लापरवाही का शिकार हुई महिला?”
नरसिंहपुर की स्वास्थ्य व्यवस्था कटघरे में, जांच पर उठे गंभीर सवाल
गाडरवारा/नरसिंहपुर।
नरसिंहपुर जिले से सामने आया एक सनसनीखेज मामला अब सीधे-सीधे निजी क्लीनिकों की कार्यप्रणाली और सरकारी जांच तंत्र की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा कर रहा है। एक महिला की मौत के बाद परिजनों ने डॉक्टर पर गंभीर लापरवाही, गलत इलाज और “ओवरडोज” जैसे संगीन आरोप लगाए हैं—लेकिन हैरानी की बात यह है कि जिला जांच समिति ने डॉक्टर को पूरी तरह “क्लीन चिट” दे दी।
क्या यह महज़ संयोग है… या फिर सिस्टम के भीतर चल रही कोई खतरनाक साठगांठ?
“साधारण बुखार बना मौत का कारण?”
ग्राम लिलवानी की रहने वाली प्रभा बाई मिश्रा को केवल सर्दी-बुखार की शिकायत थी। 12 जुलाई 2025 को उन्हें गाडरवारा के एक निजी क्लीनिक में भर्ती कराया गया। आरोप है कि बिना जरूरी जांच—जैसे शुगर, बीपी, पल्स—के मरीज को भारी मात्रा में इंजेक्शन और IV फ्लूइड चढ़ाए गए।
तीन दिन के भीतर ही हालत बिगड़ गई—और यहीं से शुरू हुआ मौत का खेल।
तीन दिन में ESR दोगुना — इलाज या लापरवाही?
परिजनों के अनुसार, इलाज के पहले दिन ESR 65 थी, जो तीन दिन में बढ़कर 125 पहुंच गई। सवाल यह है कि इलाज से सुधार होना चाहिए था या बीमारी दोगुनी?
क्या डॉक्टर मरीज की हालत समझ नहीं पाए… या जानबूझकर जोखिम उठाया गया?
जबलपुर में खुला राज: “ओवरडोज से बिगड़ी हालत”
जब मरीज को जबलपुर ले जाया गया, तो वहां डॉक्टरों ने जो बताया, उसने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया। आरोप है कि किडनी में संक्रमण, पस और गैस बन चुकी थी—और इसकी वजह “ओवरडोज” बताई गई।
आखिरकार 7 अगस्त 2025 को महिला की मौत हो गई।
“पहले से बीमार थी”—जांच समिति का दावा, परिजनों का सीधा आरोप—“झूठ!”
जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया कि मरीज पहले से “ग्रेड-5 किडनी डिजीज” से पीड़ित थी और eGFR 30 था।
लेकिन मृतका के बेटे सत्येंद्र मिश्रा ने इस दावे को सिरे से खारिज करते हुए कहा—
“यह रिपोर्ट झूठी है, डॉक्टर को बचाने के लिए कहानी गढ़ी गई है।”
सबसे बड़ा सवाल: अगर मरीज गंभीर थी तो तीन दिन तक इलाज क्यों?
क्या डॉक्टर ने शुरुआत में बीमारी की गंभीरता छिपाई?
बिना बेसिक जांच के इलाज क्यों शुरू किया गया?
हालत बिगड़ने तक मरीज को रोका क्यों गया?
क्या यह सीधी लापरवाही नहीं है?
“जांच या बचाव?”
अब सवाल सिर्फ डॉक्टर पर नहीं, बल्कि पूरी जांच प्रक्रिया पर है।
परिजनों का आरोप है कि मेडिकल सिस्टम अपने ही लोगों को बचाने में लगा है।
क्या यह जांच निष्पक्ष थी… या सिर्फ एक औपचारिकता?
जनता का सवाल — क्या छोटे शहरों में मरीज सुरक्षित हैं?
यह मामला अब एक परिवार की त्रासदी से आगे बढ़कर पूरे सिस्टम की सच्चाई उजागर कर रहा है।
क्या निजी क्लीनिकों में मरीजों पर प्रयोग हो रहा है?
क्या सरकारी जांच महज़ कागज़ी कार्रवाई बनकर रह गई है?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या आम आदमी को कभी न्याय मिल पाएगा?
Satendra Mishra
संवाददाता एक अनुभवी पत्रकार हैं, जिन्हें राजनीति, प्रशासन और सामाजिक मुद्दों की रिपोर्टिंग का व्यापक अनुभव है। वे जमीनी स्तर की खबरों को निष्पक्ष और तथ्यात्मक रूप में पाठकों तक पहुँचाने पर विश्वास रखते हैं। उनका मुख्य उद्देश्य विश्वसनीय जानकारी के साथ जनहित से जुड़े विषयों को सरल भाषा में प्रस्तुत करना है।
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