नरसिंगपुर त्योहारों पर छापे तो पड़ते हैं, पर सैंपलों की 'रिपोर्ट' और मिलावटखोरों का सच कहाँ गायब हो जाता है
- bySatendra Mishra
- 27 Aug 2026, 10:28 AM
- 7 Mins
त्योहारों पर छापे तो पड़ते हैं, पर सैंपलों की 'रिपोर्ट' और मिलावटखोरों का सच कहाँ गायब हो जाता है?
नरसिंहपुर:
त्योहारों का सीजन आते ही प्रदेश भर में प्रशासनिक अमला हरकत में आ जाता है। गाडरवारा हो या गोटेगांव, खाद्य सुरक्षा विभाग की टीमों द्वारा मिठाई की दुकानों पर ताबड़तोड़ छापे मारने, पनीर, पेड़े और बर्फी के नमूने लेने और मौके पर संदिग्ध सामग्री नष्ट कराने की खबरें सुर्खियां बनती हैं। मिलावट के खिलाफ यह कार्रवाई स्वागत योग्य है, लेकिन इसके पीछे छिपे कुछ बुनियादी सवाल आज भी आम जनता के जेहन में अनुत्तरित हैं—क्या छापे सिर्फ औपचारिकता हैं या इनसे वाकई मिलावट की जड़ें कटती हैं?
1. हर साल उठते हैं सैंपल, पर फाइलें कहाँ दफन हो जाती हैं?
हर साल त्योहारी सीजन में सैंपलिंग का यह चक्रव्यूह दोहराया जाता है। प्रेस विज्ञप्तियां जारी होती हैं कि इतने सैंपल लिए गए और कुछ मिठाइयां नष्ट कराई गईं। लेकिन, इसके बाद जनता के सामने कभी यह स्पष्ट रिपोर्ट नहीं आती कि:
- कितने प्रतिशत सैंपल फेल हुए?
- किस-किस दुकान की मिठाई मिलावटी पाई गई?
- दोषियों पर क्या जुर्माना लगा और कितनों के खिलाफ अदालती केस दर्ज हुए?
यदि व्यवस्था पारदर्शी है, तो विभाग को पिछले कम से कम दो सालों का 'सार्वजनिक रिपोर्ट कार्ड' जनता के सामने रखना चाहिए।
2. मौके पर मिठाई नष्ट, पर क्या कानूनी प्रक्रिया का पालन हुआ?
कई मामलों में टीमों द्वारा मौके पर ही संदिग्ध मिठाइयों को नष्ट कर दिया जाता है। यहाँ एक बड़ा तकनीकी और कानूनी सवाल खड़ा होता है—क्या वह मिठाई लैब की जांच में मिलावटी साबित हो चुकी थी?
- यदि नहीं, तो उसे नष्ट करने का आधार क्या था?
- क्या इस दौरान विधिवत पंचनामा बनाया गया, मात्रा दर्ज की गई और दुकानदार को इसका ठोस कारण बताया गया?
संदिग्ध खाद्य पदार्थ को तुरंत नष्ट करना और लैब रिपोर्ट में मिलावट प्रमाणित होना, दोनों अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। जनता और कारोबारियों—दोनों को यह जानने का हक है कि कार्रवाई कानून के दायरे में हुई या नहीं।
3. 'जांच' के आड़ में वसूली के दबी जुबान आरोप
कार्रवाई के दौरान कई बार छोटे और मझोले व्यापारियों के बीच से दबी जुबान में यह आवाज उठती है कि जांच और सैंपलिंग की आड़ में दबाव बनाने के खेल खेले जाते हैं। हालांकि इसे एक गंभीर सवाल के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि सीधे आरोप के रूप में। लेकिन पारदर्शिता की मांग यह कहती है कि:
- क्या कभी विभाग को जांच के नाम पर अवैध वसूली या उत्पीड़न की शिकायतें मिली हैं?
- यदि ऐसी शिकायतें मिलीं, तो उन पर क्या आंतरिक या प्रशासनिक कार्रवाई हुई?
4. जनता सिर्फ 'मिठाई' नहीं, 'भरोसा' खरीदती है
त्योहारों पर हर परिवार दूध, पनीर और मिठाइयां खरीदता है। माता-पिता अपने बच्चों को पेड़ा खिलाते वक्त यही उम्मीद करते हैं कि वे मिलावट नहीं, बल्कि शुद्धता खरीद रहे हैं। इसलिए, जनता को सिर्फ छापे की तस्वीरें या वीडियो नहीं चाहिए, बल्कि कार्रवाई का परिणाम चाहिए
- 2 साल का लेखा-जोखा: विभाग पिछले दो वर्षों के कुल लिए गए सैंपल, फेल हुए नमूनों, दर्ज मुकदमों और वसूल किए गए जुर्माने का पूरा आंकड़ा सार्वजनिक करे।
- पारदर्शिता: लैब रिपोर्ट आने के बाद दोषी प्रतिष्ठानों के नाम उजागर किए जाएं ताकि आम उपभोक्ता सजग हो सकें।
- छापे से आगे की लड़ाई: सिर्फ त्योहारों पर औपचारिकता निभाने के बजाय मिलावट की जड़ (सप्लायर और निर्माताओं) तक पहुँचकर कठोर कार्रवाई हो
जनता को अब सिर्फ ‘छापे की कार्रवाई’ का डर दिखाने वाले विज्ञापनों से आगे बढ़कर ‘सच्चाई और रिपोर्ट’ का सच चाहिए। अब दुकानों पर पड़ने वाले छापों से ज्यादा, उन छापों के बाद फाइलों में बंद होने वाले सच पर टिकी है।
Satendra Mishra
संवाददाता एक अनुभवी पत्रकार हैं, जिन्हें राजनीति, प्रशासन और सामाजिक मुद्दों की रिपोर्टिंग का व्यापक अनुभव है। वे जमीनी स्तर की खबरों को निष्पक्ष और तथ्यात्मक रूप में पाठकों तक पहुँचाने पर विश्वास रखते हैं। उनका मुख्य उद्देश्य विश्वसनीय जानकारी के साथ जनहित से जुड़े विषयों को सरल भाषा में प्रस्तुत करना है।
Latest News
गाडरवारा में प्रशासन को खुली चुनौती: सील होने के बावजूद फिर से खुली 'शिफा फार्मेसी'
- 25 August, 2026
- 6 Mins
शासकीय उत्कृष्ट विद्यालय नरसिंहपुर में विधिक जागरूकता एवं साक्षरता शिविर आयोजित
- 25 August, 2026
- 5 Mins
