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बच्चों के वार्ड में अंधेरा, बाकी अस्पताल में रोशनी! 100 बिस्तरों वाले शासकीय सिविल अस्पताल गाडरवारा में मासूमों की जिंदगी से खिलवाड़ का बड़ा खुलासा

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बच्चों के वार्ड में अंधेरा, बाकी अस्पताल में रोशनी!

100 बिस्तरों वाले शासकीय सिविल अस्पताल गाडरवारा में मासूमों की जिंदगी से खिलवाड़ का बड़ा खुलासा


गाडरवारा। 100 बिस्तरों वाला शासकीय सिविल अस्पताल एक बार फिर गंभीर अव्यवस्थाओं और लापरवाही को लेकर सुर्खियों में है। इस बार मामला सीधे नवजात एवं बीमार बच्चों की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। अस्पताल में बिजली गुल होते ही बच्चों का वार्ड घोर अंधेरे में डूब जाता है, जबकि उसी समय अस्पताल के अन्य हिस्सों — ड्यूटी डॉक्टर कक्ष, इमरजेंसी वार्ड और जनरल वार्ड — में रोशनी सामान्य रूप से चालू दिखाई देती है। इस भयावह स्थिति ने अस्पताल प्रबंधन की कार्यप्रणाली और बच्चों की सुरक्षा को लेकर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि अस्पताल परिसर में जनरेटर उपलब्ध होने के बावजूद बच्चों के वार्ड और डिलेवरी रूम के आसपास अंधेरा पसरा रहा। इससे साफ संकेत मिलता है कि जनरेटर संचालन एवं बैकअप व्यवस्था की निगरानी में गंभीर लापरवाही बरती जा रही है। स्थानीय लोगों और मरीजों के परिजनों का आरोप है कि अस्पताल प्रशासन की अनदेखी का खामियाजा मासूम बच्चों और उनके परिवारों को भुगतना पड़ रहा है। रात के समय जब नवजात एवं गंभीर रूप से बीमार बच्चे उपचाराधीन रहते हैं, उसी दौरान अचानक अंधेरा छा जाने से पूरे वार्ड में भय और अफरा-तफरी का माहौल बन जाता है। दवा वितरण, जांच, उपचार एवं निगरानी जैसे जरूरी कार्य प्रभावित होते हैं। परिजनों का कहना है कि अंधेरे के दौरान मच्छरों, उमस और अव्यवस्था के कारण बच्चों की हालत और बिगड़ने का खतरा बना रहता है।

सूत्रों के अनुसार अस्पताल में लगे जनरेटरों की सतत मॉनिटरिंग नहीं की जा रही। यदि बिजली कटौती के दौरान केवल बच्चों का वार्ड और डिलेवरी रूम ही अंधेरे में डूब रहे हैं, जबकि बाकी वार्डों में बिजली चालू रहती है, तो यह सीधे तौर पर बच्चों के रखरखाव एवं स्वास्थ्य सेवाओं में घोर लापरवाही को उजागर करता है। गौरतलब है कि 100 बिस्तरों वाला यह अस्पताल पहले भी कई गंभीर व्यवस्थागत सवालों को लेकर चर्चाओं में रहा है। कभी मरीजों के परिजनों को दवाइयों के लिए अस्पताल के बाहर निजी मेडिकल स्टोर्स की शरण लेना पड़ता है, तो कभी समय पर एम्बुलेंस सुविधा न मिलने से मरीजों को दर-दर भटकना पड़ता है। कई बार अनुभवी मेडिकल ऑफिसरों एवं विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी के कारण मजबूर मरीजों को निजी अस्पतालों का सहारा लेना पड़ता है। अब बच्चों के वार्ड में बिजली गुल होते ही अंधेरा छा जाना अस्पताल की एक और बड़ी लापरवाही के रूप में सामने आया है।

हालांकि स्वास्थ्य विभाग की कई व्यवस्थाएं सीधे जिला स्तर से संचालित होती हैं, जिनमें स्थानीय अस्पताल प्रबंधन या प्रभारी की भूमिका सीमित बताई जाती है। दवाइयों की आपूर्ति मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी कार्यालय स्तर से मांग के अनुरूप समय पर नहीं पहुंच पाने के कारण अस्पताल में दवाओं की कमी बनी रहती है। परिणामस्वरूप मरीजों के परिजनों को मजबूरी में अस्पताल के सामने संचालित निजी मेडिकल स्टोर्स से दवाइयां खरीदनी पड़ती हैं। वहीं क्षेत्र में शासकीय 108 एम्बुलेंस सेवाओं की कमी को लेकर भी लगातार सवाल उठते रहे हैं। स्थानीय लोगों के बीच यह आशंका जताई जाती रही है कि सरकारी एम्बुलेंस की कमी का हवाला देकर निजी एम्बुलेंस संचालकों को लाभ पहुंचाया जा रहा है। इस पूरे मामले में जिला स्तर की व्यवस्थाओं और संचालन प्रणाली पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

सूत्रों के मुताबिक अस्पताल में लगभग 12 अनुभवी मेडिकल ऑफिसर एवं विशेषज्ञ डॉक्टरों की आवश्यकता है, जबकि करीब 6 पद लंबे समय से खाली पड़े हुए हैं। इसके बावजूद प्रतिदिन लगभग 1000 से 1500 मरीजों का आवागमन अस्पताल में बना रहता है। कई बार समाचार पत्रों एवं प्रशासनिक स्तर पर डॉक्टरों की कमी और स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर मांग उठाई गई, लेकिन अब तक स्थिति में कोई बड़ा सुधार दिखाई नहीं दिया।

अस्पताल जैसी संवेदनशील जगह पर बिजली बाधित होने की स्थिति में तत्काल बैकअप व्यवस्था सक्रिय होना अनिवार्य माना जाता है। इसके बावजूद नवजात बच्चों का वार्ड अंधेरे में छोड़ देना स्वास्थ्य विभाग की तैयारियों और जिम्मेदार अधिकारियों की कार्यशैली पर कठोर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

“जहां अस्पताल में मासूम बच्चों को सुरक्षित उपचार मिलना चाहिए, वहां अंधेरे में डूबा वार्ड स्वास्थ्य व्यवस्था की भयावह तस्वीर पेश कर रहा है। यदि समय रहते व्यवस्थाओं में सुधार नहीं हुआ, तो कभी भी बड़ा हादसा होने से इंकार नहीं किया जा सकता।”

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Author

Satendra Mishra

संवाददाता एक अनुभवी पत्रकार हैं, जिन्हें राजनीति, प्रशासन और सामाजिक मुद्दों की रिपोर्टिंग का व्यापक अनुभव है। वे जमीनी स्तर की खबरों को निष्पक्ष और तथ्यात्मक रूप में पाठकों तक पहुँचाने पर विश्वास रखते हैं। उनका मुख्य उद्देश्य विश्वसनीय जानकारी के साथ जनहित से जुड़े विषयों को सरल भाषा में प्रस्तुत करना है।