नरसिंगपुर गंभीर फर्जीवाड़ा या प्रशासनिक अंधेरगर्दी? गाडरवारा अस्पताल में बिना डिग्री व रजिस्ट्रेशन 'मौखिक आदेश' पर मरीजों का इलाज कर रहा था फर्जी डॉक्टर! RTI में बड़ा खुलासा: न तो कोई नियुक्ति आदेश, न मेडिकल पंजीयन के दस्तावेज
- bySatendra Mishra
- 07 Oct 2026, 03:10 PM
- 8 Mins
गंभीर फर्जीवाड़ा या प्रशासनिक अंधेरगर्दी? गाडरवारा अस्पताल में बिना डिग्री व रजिस्ट्रेशन 'मौखिक आदेश' पर मरीजों का इलाज कर रहा था फर्जी डॉक्टर!
RTI में बड़ा खुलासा: न तो कोई नियुक्ति आदेश, न मेडिकल पंजीयन के दस्तावेज; बायोमीट्रिक और CCTV फुटेज के नाम पर भी लीपापोती
गाडरवारा / नरसिंहपुर:
शासकीय सिविल अस्पताल गाडरवारा में मरीजों की जिंदगी के साथ खुलेआम खिलवाड़ और गंभीर प्रशासनिक लापरवाही का एक रोंगटे खड़े कर देने वाला मामला सामने आया है। सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत मिली जानकारी ने स्वास्थ्य विभाग के दावों की धज्जियां उड़ा कर रख दी हैं। अस्पताल में पदस्थ तथाकथित डॉक्टर परितोष जैन के पास न तो कोई वैध मेडिकल पंजीयन है, न शैक्षणिक योग्यता के दस्तावेज और न ही कोई लिखित नियुक्ति आदेश—फिर भी वे अस्पताल में मरीजों का इलाज कर रहे थे।
1. बिना रजिस्ट्रेशन और डिग्री के अस्पताल में 'डॉक्टर': सीधे मरीजों की जान से खिलवाड़
सत्येन्द्र कुमार मिश्रा द्वारा मांगी गई जानकारी के जवाब में अस्पताल प्रशासन ने खुद स्वीकार किया है कि डॉ. परितोष जैन के शैक्षणिक योग्यता, डॉक्टरी डिग्री और मेडिकल काउंसिल पंजीयन (Registration) का कोई भी रिकॉर्ड अस्पताल कार्यालय में मौजूद ही नहीं है। सवाल यह उठता है कि बिना किसी डॉक्टरी पंजीयन और सत्यापन के किसी व्यक्ति को सरकारी अस्पताल में मरीजों का इलाज करने और परामर्श देने की छूट कैसे दे दी गई? क्या यह मरीजों की जान को सीधे खतरे में डालने की आपराधिक लापरवाही नहीं है?
2. 'मौखिक आदेश' पर चल रहा था अस्पताल, लिखित में कोई रिकॉर्ड नहीं
अस्पताल के प्रभारी अधीक्षक द्वारा जारी लिखित पत्र में स्वीकार किया गया है कि डॉ. परितोष जैन की गाडरवारा अस्पताल में न तो कोई नियमित पदस्थापना है और न ही कोई लिखित आधिकारिक आदेश। उन्हें महज तत्कालीन मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) के "मौखिक निर्देशों" के आधार पर अस्पताल में प्रैक्टिस कराई जा रही थी।
बड़ा सवाल: क्या देश और राज्य का स्वास्थ्य विभाग अब लिखित नियमों को दरकिनार कर केवल अफसरों की 'मौखिक तानाशाही' और 'मौखिक आदेशों' से चलेगा? किस नियम के तहत एक गैर-पंजीकृत व्यक्ति को सरकारी अस्पताल में प्रैक्टिस करने की खुली छूट दी गई?
3. सबूत मिटाने का खेल? CCTV और अटेंडेंस के नाम पर गोलमोल जवाब
18 और 19 अगस्त 2026 की रात्रि ड्यूटी के दौरान डॉक्टरों की मौजूदगी, बायोमीट्रिक अटेंडेंस और CCTV फुटेज की मांग पर अस्पताल प्रशासन का रवैया पूरी तरह से संदेहास्पद नजर आता है:
- बायोमीट्रिक गायब: अस्पताल ने सफाई दी कि वहां बायोमीट्रिक हाजिरी लगाने की व्यवस्था ही नहीं है, बल्कि 'सार्थक पोर्टल' से काम चलाया जाता है।
- CCTV फुटेज ऑटो-डिलीट: अस्पताल परिसर के 32 CCTV कैमरों की रिकॉर्डिंग को लेकर तर्क दिया गया कि हार्डडिस्क में केवल 10 दिनों का बैकअप रहता है और पुरानी फुटेज अपने आप डिलीट (Auto-Remove) हो गई।
जिस तरह से ड्यूटी रोस्टर और उपस्थिति के ठोस सबूतों को 'तकनीकी वजहों' का बहाना बनाकर नकारा गया है, वह सीधे तौर पर मामलों पर पर्दा डालने और सबूतों को गायब करने की बू देता है।
उच्च स्तरीय जांच और एफआईआर (FIR) की मांग
बिना किसी शैक्षणिक/रजिस्ट्रेशन रिकॉर्ड के किसी व्यक्ति से मरीजों की जिंदगी का सौदा करवाना एक अक्षम्य अपराध है। यह सीधे तौर पर स्वास्थ्य विभाग की साख पर काला धब्बा है। स्थानीय नागरिकों और बुद्धिजीवियों ने मांग की है कि:
- फर्जीवाड़े की उच्च स्तरीय स्वतंत्र जांच कराई जाए कि अब तक उक्त व्यक्ति ने किन-किन मरीजों का इलाज किया और इसके पीछे किन प्रशासनिक अधिकारियों का संरक्षण था।
अगर इस गंभीर लापरवाही पर तुरंत सख्त कार्रवाई नहीं होती, तो यह साफ है कि गाडरवारा का स्वास्थ्य महकमा मरीजों की जान की कीमत पर केवल कागजी लीपापोती और फर्जीवाड़े को संरक्षण दे रहा है।
Satendra Mishra
संवाददाता एक अनुभवी पत्रकार हैं, जिन्हें राजनीति, प्रशासन और सामाजिक मुद्दों की रिपोर्टिंग का व्यापक अनुभव है। वे जमीनी स्तर की खबरों को निष्पक्ष और तथ्यात्मक रूप में पाठकों तक पहुँचाने पर विश्वास रखते हैं। उनका मुख्य उद्देश्य विश्वसनीय जानकारी के साथ जनहित से जुड़े विषयों को सरल भाषा में प्रस्तुत करना है।
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