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खंडहरों में कैद गोंडवाना का गौरव, कंधों पर पहुंचीं मां शेरावाली; फिर भी चौगान किले तक सड़क क्यों नहीं?

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खंडहरों में कैद गोंडवाना का गौरव, कंधों पर पहुंचीं मां शेरावाली; फिर भी चौगान किले तक सड़क क्यों नहीं?

65–70 लाख रुपये खर्च होने के दावे के बीच दुर्गम रास्तों का सहारा, राजा संग्राम शाह और वीर नारायण के इतिहास से जुड़ी धरोहर संरक्षण को मोहताज; मां नर्मदा कुंड की सफाई, सड़क निर्माण के अभिलेखों की जांच और पुरातात्विक संरक्षण की उठी मांग

नौ दिनों तक पहाड़ी पर गूंजे जयकारे, दशहरे पर नम आंखों से दी गई विदाई, लेकिन बुनियादी सुविधाओं का इंतजार बरकरार; युवाओं ने कंधों पर उठाई माता की प्रतिमा, अब शासन-प्रशासन की जवाबदेही का सवाल

गाडरवारा।

सतपुड़ा की पहाड़ियों के बीच खामोशी से खड़ा चौगान का ऐतिहासिक किला आज शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली और ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। जिन पहाड़ियों ने कभी गोंडवाना साम्राज्य के शौर्य, सामरिक शक्ति और ऐतिहासिक संघर्षों को देखा, उन्हीं पहाड़ियों पर आज इतिहास के अवशेष बिखरे पड़े हैं। कहीं प्राचीन स्थापत्य खंड अतीत की कहानी सुनाते हैं, तो कहीं खंडहर बन चुकी संरचनाएं संरक्षण की बाट जोह रही हैं। इसी ऐतिहासिक पहाड़ी पर शारदीय नवरात्रि के दौरान पहली बार मां शेरावाली की प्रतिमा स्थापित हुई। श्रद्धालुओं का उत्साह ऐसा था कि जब वाहन दुर्गम रास्ते के कारण ऊपर तक नहीं पहुंच सके, तो युवाओं ने मचान पर प्रतिमा रखकर अपने कंधों पर उठाया और कठिन चढ़ाई पार करते हुए माता रानी को पहाड़ी तक पहुंचाया।

नौ दिनों तक भक्ति और आस्था का वातावरण बना रहा। आसपास के गांवों के श्रद्धालुओं ने सामूहिक सहयोग से आयोजन को सफल बनाया और दशहरे पर नम आंखों से माता रानी को विदाई दी। लेकिन इस धार्मिक आयोजन ने एक ऐसा सवाल भी सामने ला दिया, जिसका जवाब संबंधित विभागों और जिम्मेदार अधिकारियों को देना चाहिए—जब श्रद्धालु अपने कंधों पर माता की प्रतिमा लेकर पहाड़ी तक पहुंच सकते हैं, तो वर्षों के बाद भी चौगान किले तक सुविधाजनक सड़क क्यों नहीं पहुंच पाई?

स्थानीय स्तर पर सड़क निर्माण के लिए पूर्व वर्षों में लगभग 65 से 70 लाख रुपये खर्च किए जाने अथवा राशि निकाले जाने का दावा किया जा रहा है। इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि सरकारी अभिलेखों से होना शेष है। यदि वास्तव में इस कार्य के लिए इतनी राशि स्वीकृत और व्यय की गई है, तो निर्माण की वास्तविक स्थिति, स्वीकृत कार्य, भुगतान और मौके पर उपलब्ध सुविधाओं का हिसाब सार्वजनिक होना चाहिए। आखिर सार्वजनिक धन खर्च होने के बावजूद ऐतिहासिक स्थल तक पहुंचने में इतनी कठिनाई क्यों बनी हुई है? यह सवाल अब केवल सड़क का नहीं, बल्कि जनसुविधाओं, सार्वजनिक धन की जवाबदेही और ऐतिहासिक विरासत के भविष्य का भी है।

कंधों पर माता की प्रतिमा, दुर्गम रास्तों से संघर्ष; आस्था ने दिखाया प्रशासन को आईना

चौगान किले की पहाड़ी पर मां शेरावाली की प्रतिमा स्थापित करना श्रद्धालुओं के लिए आसान नहीं था। पथरीला रास्ता, कठिन चढ़ाई और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियां चुनौती बनी हुई थीं। वाहन प्रतिमा को पहाड़ी तक नहीं पहुंचा सके, लेकिन श्रद्धालुओं की आस्था ने हार नहीं मानी। नवयुवक मित्र मंडल गौ रक्षक समिति मृगन्नाथ-चौगान किला की पहल और क्षेत्रवासियों के सहयोग से युवाओं ने मचान पर प्रतिमा रखी और कंधों के सहारे पहाड़ी की ओर बढ़ चले। रास्ते में जय माता दी के जयकारे गूंजते रहे।

पापड़ा, बरखेड़ा, भेरोपुर, प्रेमपुर, सिल्हेटी, सेसाडावर, बेलखेड़ी, डोंगरखोह, किराहकोटा और बिजनपुर सहित आसपास के गांवों के श्रद्धालुओं ने आयोजन में भागीदारी निभाई। नौ दिनों तक पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन और देवी जस के बीच पहाड़ी पर भक्तिमय वातावरण बना रहा। दशहरे पर प्रतिमा विसर्जन के दौरान श्रद्धालु भावुक हो उठे।

यह आयोजन धार्मिक आस्था और ग्रामीण एकता की मिसाल जरूर बना, लेकिन साथ ही इसने बुनियादी सुविधाओं की कमी को भी उजागर कर दिया। यदि यहां सड़क, सुरक्षित आवागमन और आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध होतीं, तो श्रद्धालुओं को प्रतिमा पहुंचाने के लिए इस तरह कठिन परिस्थितियों का सामना नहीं करना पड़ता। भविष्य में धार्मिक आयोजन और पर्यटकों की आवाजाही बढ़ने की स्थिति में सड़क की कमी और भी बड़ी समस्या बन सकती है।

65–70 लाख रुपये के दावे पर उठे सवाल, सरकारी रिकॉर्ड से हो स्थिति स्पष्ट

चौगान किले तक पहुंच मार्ग के निर्माण के लिए कथित तौर पर 65 से 70 लाख रुपये की राशि खर्च किए जाने अथवा निकाले जाने की चर्चा ने सरकारी निर्माण कार्यों की पारदर्शिता पर सवाल खड़े किए हैं। हालांकि, राशि और कार्य की वास्तविक स्थिति की पुष्टि संबंधित विभागीय अभिलेखों से होना आवश्यक है। इसलिए इस मामले में आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर दस्तावेजों के आधार पर स्थिति स्पष्ट करना जरूरी है।

जिला प्रशासन को संबंधित पंचायत, निर्माण एजेंसी और विभाग से निम्न बिंदुओं पर जानकारी लेकर सार्वजनिक करनी चाहिए—

- सड़क निर्माण के लिए किस योजना के अंतर्गत कितनी राशि स्वीकृत की गई?
- तकनीकी एवं प्रशासनिक स्वीकृति कब जारी हुई और निर्माण कार्य की निर्धारित लंबाई कितनी थी?
- कार्यादेश किस एजेंसी या ठेकेदार को दिया गया और निर्माण की समय-सीमा क्या तय की गई थी?
- अब तक कितना भुगतान किया गया तथा माप पुस्तिका में कितने कार्य का सत्यापन दर्ज है?
- मौके पर सड़क की वास्तविक लंबाई, गुणवत्ता और वर्तमान स्थिति क्या है?
- क्या कार्य का भौतिक सत्यापन, गुणवत्ता परीक्षण और पूर्णता प्रमाणपत्र जारी किया गया है?

इन सवालों का जवाब अनुमान या मौखिक दावों से नहीं, बल्कि स्वीकृति आदेश, कार्यादेश, माप पुस्तिका, भुगतान विवरण और स्थल निरीक्षण के आधार पर सामने आना चाहिए।

जिला प्रशासन की निगरानी में तकनीकी अधिकारियों की टीम से मौके का निरीक्षण कराया जाए और सरकारी रिकॉर्ड का वास्तविक स्थिति से मिलान किया जाए। यदि जांच में निर्माण कार्य में कमी, भुगतान और वास्तविक कार्य में अंतर अथवा कोई वित्तीय अनियमितता प्रमाणित होती है, तो संबंधित जिम्मेदारों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। वहीं, यदि कार्य निर्धारित मानकों के अनुरूप हुआ है, तो उसकी स्थिति और वर्तमान समस्याओं का कारण भी जनता के सामने स्पष्ट होना चाहिए।

राजा संग्राम शाह और वीर नारायण के इतिहास से जुड़ी धरोहर

चौगान क्षेत्र का प्राचीन चौरागढ़ दुर्ग गोंडवाना के इतिहास और मध्यभारत की ऐतिहासिक परंपराओं से जुड़ा महत्वपूर्ण स्थल माना जाता है। गोंड शासक राजा संग्राम शाह का नाम राज्य के विस्तार, दुर्गों और सामरिक व्यवस्था के संदर्भ में विशेष महत्व रखता है। पहाड़ी पर स्थित दुर्ग की भौगोलिक संरचना तत्कालीन समय में सुरक्षा और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रही होगी।

गोंडवाना की वीरता और स्वाभिमान की चर्चा रानी दुर्गावती तथा उनके पुत्र वीर नारायण के संघर्ष के बिना अधूरी है। वर्ष 1564 में मुगल सेनापति आसफ खां के आक्रमण के दौरान रानी दुर्गावती ने प्रतिरोध करते हुए वीरगति प्राप्त की। वीर नारायण का संघर्ष भी गोंडवाना के ऐतिहासिक घटनाक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

चौगान और चौरागढ़ से जुड़ी ऐतिहासिक पहचान, स्थानीय परंपराओं और उपलब्ध पुरातात्विक साक्ष्यों का व्यवस्थित अध्ययन किए जाने की आवश्यकता है। राजा प्रेमनारायण शाह से संबंधित स्थानीय ऐतिहासिक मान्यताएं और क्षेत्र की सांस्कृतिक परंपराएं भी इस स्थल की पहचान का हिस्सा हैं। इन सभी तथ्यों को प्रमाणिक अभिलेखों, ऐतिहासिक दस्तावेजों और विशेषज्ञों के शोध के आधार पर संकलित किया जाना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां इस विरासत का वास्तविक महत्व समझ सकें।

रानीताल, रंगमहल और प्राचीन अवशेषों को बचाने की जरूरत

चौरागढ़ दुर्ग से संबंधित विवरणों में रानीताल, रंगमहल, खंदक, प्राचीन मंदिरों और राजमहल से जुड़े अवशेषों का उल्लेख मिलता है। यहां विभिन्न कालखंडों की स्थापत्य परंपराओं और कलाकृतियों से जुड़े अवशेष होने की जानकारी भी सामने आती है। इन संरचनाओं का वैज्ञानिक अध्ययन क्षेत्र के इतिहास की कई महत्वपूर्ण कड़ियों को समझने में मदद कर सकता है।

लेकिन किसी भी प्राचीन दुर्ग की पहचान केवल उसके इतिहास से नहीं, बल्कि उसके वर्तमान संरक्षण से भी तय होती है। समय, मौसम, वनस्पति और प्राकृतिक क्षरण के कारण पुराने निर्माणों को नुकसान पहुंच सकता है। यदि इन अवशेषों का नियमित निरीक्षण, दस्तावेजीकरण और आवश्यक संरक्षण नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में ऐतिहासिक महत्व के कई निशान हमेशा के लिए मिट सकते हैं।

चौरागढ़ दुर्ग के संरक्षण को लेकर संबंधित पुरातत्व विभाग को स्थल की वर्तमान स्थिति का विस्तृत सर्वेक्षण कराना चाहिए। प्रत्येक महत्वपूर्ण संरचना की स्थिति दर्ज की जाए, उपलब्ध अभिलेखों और पुरातात्विक साक्ष्यों का संकलन किया जाए तथा संरक्षण की प्राथमिकताएं तय की जाएं। किसी भी निर्माण या मरम्मत का कार्य विशेषज्ञों की देखरेख में और पुरातात्विक मानकों के अनुरूप ही किया जाना चाहिए।

यदि यह दुर्ग मध्यप्रदेश शासन के पुरातत्व विभाग के संरक्षित स्मारकों में अधिसूचित है, तो उसकी अधिसूचना, संरक्षण संबंधी जिम्मेदारियों और वर्तमान रखरखाव व्यवस्था की जानकारी भी सार्वजनिक की जानी चाहिए। संरक्षित स्मारक का दर्जा तभी सार्थक होगा, जब उसकी ऐतिहासिक पहचान को बचाने के लिए धरातल पर प्रभावी व्यवस्था दिखाई दे।

मां नर्मदा कुंड की सफाई और बुनियादी सुविधाओं का इंतजार

चौगान किले की ऐतिहासिक पहचान के साथ इसका प्राकृतिक और धार्मिक महत्व भी जुड़ा हुआ है। मां नर्मदा कुंड की साफ-सफाई, नियमित देखरेख और आसपास की व्यवस्था को लेकर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। धार्मिक आयोजन के समय बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना को देखते हुए स्वच्छता, सुरक्षित रास्ते, पेयजल और आवश्यक संकेतक जैसी सुविधाएं महत्वपूर्ण हो जाती हैं।

प्रशासन को कुंड और आसपास के क्षेत्र की स्थिति का निरीक्षण कर नियमित सफाई की व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए। यदि वहां जल संरचना या प्राचीन निर्माण मौजूद हैं, तो उनकी प्रकृति और ऐतिहासिक महत्व का आकलन विशेषज्ञों से कराया जाना चाहिए। स्वच्छता और विकास के नाम पर ऐसी कोई गतिविधि नहीं होनी चाहिए, जिससे प्राचीन संरचनाओं अथवा प्राकृतिक परिवेश को नुकसान पहुंचे।

इसके साथ ही, पहाड़ी तक पहुंचने वाले रास्ते की सुरक्षा, दिशा-सूचक बोर्ड, प्राथमिक उपचार की सुविधा और आपात स्थिति में सहायता की व्यवस्था पर भी विचार किया जाना चाहिए। दुर्गम पहाड़ी पर धार्मिक आयोजन के दौरान श्रद्धालुओं की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।

ऐतिहासिक और धार्मिक पर्यटन की संभावना, लेकिन विकास वैज्ञानिक तरीके से हो

चौगान किले में इतिहास, प्रकृति, धार्मिक आस्था और स्थानीय संस्कृति से जुड़े पर्यटन की संभावनाएं हैं। यहां की ऐतिहासिक पहचान को प्रमाणिक जानकारी के साथ प्रस्तुत किया जाए, तो विद्यार्थी, शोधार्थी, इतिहासप्रेमी और पर्यटक इस क्षेत्र की ओर आकर्षित हो सकते हैं।

इसके लिए सबसे पहले सड़क और सुरक्षित आवागमन की वास्तविक स्थिति का आकलन करना होगा। इसके बाद आवश्यक सुविधाओं, स्वच्छता, सूचना-पट, स्थानीय मार्गदर्शन और संरक्षण आधारित पर्यटन की योजना बनाई जा सकती है। लेकिन पर्यटन विकास का अर्थ ऐतिहासिक स्थल पर अनियोजित निर्माण करना नहीं होना चाहिए। दुर्ग की मूल संरचना, पहाड़ी के प्राकृतिक स्वरूप और पुरातात्विक अवशेषों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

जिला प्रशासन, पुरातत्व विभाग, संबंधित पंचायत, पर्यटन विभाग और स्थानीय जनप्रतिनिधियों के बीच समन्वय स्थापित कर चरणबद्ध योजना तैयार की जा सकती है। स्थानीय युवाओं और ग्रामीणों को भी संरक्षण तथा स्वच्छता संबंधी गतिविधियों से जोड़कर इस धरोहर के प्रति सामुदायिक जिम्मेदारी को मजबूत किया जा सकता है।

आस्था ने निभाई जिम्मेदारी, अब शासन-प्रशासन की बारी

चौगान किले पर मां शेरावाली की प्रतिमा की स्थापना ने यह साबित किया कि क्षेत्र के लोगों के मन में अपनी धार्मिक और ऐतिहासिक विरासत के प्रति गहरी आस्था है। युवाओं ने कठिन पहाड़ी पर माता की प्रतिमा पहुंचाई, ग्रामीणों ने सहयोग किया और नौ दिनों तक पूरा क्षेत्र भक्ति में सराबोर रहा।

अब जरूरत है कि इस जनभावना को ठोस विकास और संरक्षण में बदला जाए। जिला प्रशासन सड़क निर्माण से जुड़े दावों की निष्पक्ष जांच कराए, संबंधित विभाग निर्माण कार्यों का रिकॉर्ड सार्वजनिक करें, पुरातत्व विभाग ऐतिहासिक संरचनाओं की स्थिति का आकलन करे और मां नर्मदा कुंड की सफाई व आवश्यक सुविधाओं के लिए स्पष्ट कार्ययोजना बनाए।

चौगान किले का सवाल किसी एक सड़क, एक आयोजन या एक विभाग तक सीमित नहीं है। यह सवाल है कि क्या हमारी ऐतिहासिक विरासत केवल भाषणों और आयोजनों तक सीमित रहेगी, या उसे बचाने के लिए जिम्मेदार संस्थाएं वास्तविक कदम भी उठाएंगी?

जिस धरोहर ने सदियों का इतिहास अपने भीतर समेट रखा है, उसे उपेक्षा के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। जिन युवाओं ने मां की प्रतिमा अपने कंधों पर उठाकर दुर्गम पहाड़ी पार की, उनकी आस्था अब शासन-प्रशासन से जवाब मांग रही है।

क्या जिला प्रशासन सड़क निर्माण के दावों की जांच कराएगा? क्या पुरातत्व विभाग चौरागढ़ के अवशेषों को सुरक्षित रखने के लिए प्रभावी संरक्षण योजना बनाएगा? और क्या मां नर्मदा कुंड की सफाई तथा श्रद्धालुओं की बुनियादी सुविधाओं के लिए समयबद्ध कदम उठाए जाएंगे?

इन सवालों का जवाब अब केवल आश्वासनों से नहीं, बल्कि धरातल पर दिखाई देने वाले कार्यों से मिलना चाहिए। क्योंकि इतिहास की धरोहरें एक बार नष्ट हो जाएं, तो उन्हें दोबारा उसी स्वरूप में लौटाना संभव नहीं होता।

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Author

Satendra Mishra

संवाददाता एक अनुभवी पत्रकार हैं, जिन्हें राजनीति, प्रशासन और सामाजिक मुद्दों की रिपोर्टिंग का व्यापक अनुभव है। वे जमीनी स्तर की खबरों को निष्पक्ष और तथ्यात्मक रूप में पाठकों तक पहुँचाने पर विश्वास रखते हैं। उनका मुख्य उद्देश्य विश्वसनीय जानकारी के साथ जनहित से जुड़े विषयों को सरल भाषा में प्रस्तुत करना है।